समाजवाद और साम्यवाद भारत में इसकी उपयोगिता
लेनिन से लेकर कार्ल मार्क्स तक सबने पूंजी को एक बुराई माना और इसके विकल्प के लिए साम्यवाद का सिद्दांत लाये ।
इनका कहना है की पूंजीवाद ख़त्म होना चाहये और साम्यवाद आना चाहये ।
साम्यवाद भी एक तरह का संघटित है जिसमे मुठीभर लोग ही सत्ता एन्जॉय करते है ।
अगर ये इतना कारगर होता हो बंगाल देश में सबसे आगे होता आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से । पर ऐसा नहीं हुआ ।
कम्युनिस्ट धर्म को अफीम मानते है किसी हद तक ये सही भी हो सकता है पर पूर्ण सत्य नहीं ।
नक्सलवाद भी इसी की उपज है एक से छीन ना दूसरे को देना कोई समाधान नहीं हो सकता है जब तक की दूसरे का स्तर बढ़ाने का प्रत्यन न किया जाये।
लोकतंत्र में इसी चीज को आरक्षण का नाम देकर दूसरे लोगो को देना शुरू कर दिया ।
अगर इस समस्या की जड़ को देखे तो पता लगता है की तीन प्रकार के नेताओ ने इस समस्या को खाद दिया ।
1 धार्मिक नेता
2 राज नेता
3 समाज सुधार के ठेकेदार
2 राज नेता
3 समाज सुधार के ठेकेदार
इन तीनो के नेक्सस ने आम जनता को कभी नही अपना स्तर सुधारने का मौका ही नहीं दिया और जनता को अवतारवाद /हीरो इज्म के चक्र व्यूह में उलझा दिया अंब बेचारी जनता अपनी शक्ति भूलकर अपनी हर समस्या को हीरो के द्वारा हल कराना चाहती है।
धार्मिक गुरुओ ने भी इसमें खूब खाद पानी दिया और अवतारो की एक लिस्ट बना दी की फलाने युग में फलाना समस्या का समाधान करेगा।
अब बेचारी जनता मसीहां का वेट करती है और बाकी लाइफ एन्जॉय करते है ।
लोकतंत्र में भी हर पाँच साल में एक मसीहां पैदा हो जाता है जो आम जन को। वादों का झुनझुना देता है और यही सिलसला चलता रहता है ।
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